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मा. कांशीरामजी साहेब

मा. कांशीरामजी साहेब

(Honorable Kansiramji Saheb)

Honorable Kanshiram

कांशीराम – भारत की राजनीति में एकअनूठा व्यक्तित्व | बालक कांशीरामका जन्म खवासपुर गाँव – जिला रोपड़ –पंजाब में एक रामदासियापरिवार में हुआ था | गाँव मेंही शिक्षा ग्रहण करने वाले बालककांशीराम के दादा व चाचा फ़ौज में थे |कांशीराम ने विज्ञानं स्नातककी शिक्षा रोपड़ में ग्रहण की | बाल्यकल से लेकर शैक्षिक जीवन तक कांशीरामको सामाजिक भेदभाव व छुआ छूतका अनुभव नहीं था क्यूंकि आर्य समाज वसिख संप्रदाय के प्रभाव के चलते पंजाब मेंसामाजिक बुराई समाप्त प्राय थी |आखिर युवक कांशीराम से – एक शिक्षितनौकरी शुदा कांशीराम से सामाजिकराजनीतिक चेतना का नायक मान्यवरकांशीराम तक का सफ़र कैसे शुरू हुआ ? यहएक दिलचस्प और प्रेरक प्रसंग है | वर्तमानपरिस्थितियो में भी मानों इतिहासखुद को दोहराने की प्रक्रिया मेंलगा हुआ है | आभास होता है कि कालकी गति स्वयं को दोहारने वाली है |कांशीराम १९५७ में सर्वे ऑफ़इंडिया की परीक्षा में उत्तीर्ण हुये |विभाग में कार्यभार ग्रहण करने के पूर्वभरवाए जाने वाले बंद को भरने से इंकारकरके कांशीराम ने वो नौकरी ना करनेका फैसला किया |
तत्पश्चात आपनेपूना में एक्स प्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंटलेबोरेट्री ( ई आर डी एल ) में अनुसन्धानसहायक के पद पे कार्य करना प्रारंभकिया | अनुसन्धान सहायक के पद पेकार्य रत कांशीरामकी रूचि सामाजिक-राजनीतिकगतिविधियों की तरफ होने लगी थी |कांशीराम की इसी नौकरी के दौरान ईआर डी एल में एक ऐसी घटना घटी जिसनेशिक्षित कांशीराम को जो अगर यहघटना ना घटी होती तो शायदगुमनामी में ही गम रह जाता ,को करोडो – करोड़ लोगो का मान्यवरकांशीराम बनाने में अहम्भूमिका अदा की |दरअसल इसी समय बुद्ध जयंती व अम्बेडकरजयंती के अवकाश को निरस्त करनेका निर्णय ई आर डी एल ने लिया औरजब उसका विरोध वही के एक कर्मचारी नेकिया तो उसे नौकरी सेनिलंबित करदिया गया | कांशीराम सेना रहा गया , अपने मित्रो-सहकर्मियों के तमाम मना करने के बावजूदकांशीराम ने अन्याय के खिलाफप्रतिकार का संकल्प लेते हुये उस निलंबितकर्मचारी की मदद कारी तथा मा ०न्यायालय में इसके विरोध में वाद दायरकिया | मा० न्यायालय ने न्यायकिया तथा निलंबित कर्मचारी केनिलंबन को रद्द करने के साथ साथ बुद्ध वअम्बेडकर जयंती दोनों के अवकाशको बहाल किया | आज उत्तर प्रदेशकी समाजवादी पार्टी की सरकार नेमान्यवर कांशीराम की पुण्यतिथि परघोषित अवकाश को रद्द करते हुयेपुनः वही परिस्थितिया – हालातपैदा कर दिया है जो किसी नएकांशीराम के आगे आने का मार्ग प्रशस्तकर सकता है |सामाजिक – राजनीतिकदिलचस्पी लेना प्रारंभ कर चुके कांशीरामने डॉ भीमराव अम्बेडकर को उनकेविचारो-पुस्तकोंके अध्धयन से आत्मसातकरना प्रारंभ कर दिया |इसी अध्धयन काल में कांशीराम नेनौकरी का परित्याग किया और संकल्पलिया — “मैं कभी शादी नहीं करूँगा औरना ही किसी प्रकार की कोईव्यक्तिगत संपत्ति अर्जित करूँगा |”सामाजिक बुराइयों की जड़ जातिवादहै और इसको समाप्त करना जरुरी है , यहबात समाजवादी चिन्तकयुगद्रष्टा डॉ राममनोहरलोहिया हमेशा दोहराते रहते थे |डॉ लोहिया ने कार्यक्रमभी दिया था , जाती तोड़ो – समाजजोड़ो | इसी जाती के विष को भांपतेहुये , परखते हुये कांशीराम ने कहा था कि ,— ” मुझे लगा कि जातिवाद सामाजिकव्यवस्था ही सारी बुराइयों की जड़ है |जाती विहीन समाज की स्थापना केबगैर इस तरह की बुराइयाँ समाप्तनहीं हो सकती है | मैं इस बुराई को ख़त्मकरने का काम करूँगा इसीलिए मैंने १९६४ मेंअपनी नौकरी त्याग दी थी | “सामाजिक-राजनीतिकगतिविधियों में पूरी तरह तल्लीनकांशीराम ने महाराष्ट्र रिपब्लिकपार्टी तथा डॉ अम्बेडकरद्वारा स्थापित पीपुल्स एजुकेशनसोसायटी के लिए काम शुरू किया |लगभग ४ वर्षो तक इन संगठनो में कार्य करनेके पश्चात् कांशीराम ने अनुभवकिया कि इन संगठनो में आन्तरिक मतभेदबहुत है तथा संगठन – समाज का मूल कम करपाना इसमें संभव नहीं है |

Honorable Kanshiramji saheb

कांशीराम नेनया संगठन बनाने और शोषित समाजको एक साथ लाने कि दिशा मेंसोचा और ६ दिसम्बर , १९७३ को पुन वदिल्ली के चन्दसरकारी कर्मचारियों को साथ लेकरबामसेफ का गठन किया | बामसेफको अखिल भारतीय स्वरुप देने मेंकांशीराम को ५ वर्षो का समय लगा और६ दिसम्बर , १९७८ को दिल्ली मेंही बामसेफ की औपचारिकघोषणा की | बामसेफको सरकारी कर्मचारियों की संस्था केरूप में खड़ा करके एक मजबूत सामाजिकआधार के साथ साथ आर्थिकमजबूती का कार्य कांशीराम ने किया |कांशीराम के ही अनुसार ,- ” जिस समाजकी राजनीतिक जड़े मजबूत नहीं होती, उस समाज की राजनीति कभी कामयाबनहीं होती | मैंने बामसेफ बना कर दलित-शोषित समाज का राजनीतिक आधारमजबूत किया | Honorable Kanshiramji

“सक्रिय राजनीति में कदम रख चुकेकांशीराम की नज़र सर्वोच्च सत्ता पेथी , बगैर किसी लाग लपेट के कांशीरामका कहना था, – “राजनीति सत्ता केलिए होती है और सत्ता बिना संघर्ष के नहीं मिलती |” असमान सामाजिकव्यवस्था के खिलाफ संघर्ष को धार देने केलिए , जाती विहीन समाजकी सथापना के लिए , समाज मेंबराबरी कायम करने के लिए कांशीराम ने१९८१ में दलित शोषित समाज संघर्षसमिति ( डी एस फोर ) का गठन किया |डी एस फोर के बैनर तले कांशीराम ने ‘समता और सम्मान के लिए संघर्ष ‘आन्दोलनकी शुरुआत ६ दिसम्बर ,१९८३ को प्रारंभकिया | देश के पाँच कोनोकन्याकुमारी, कोहिमा, कारगिल,पूरी तथा पोरबंदर से कांशीराम ने दो-दो दिन के अंतराल पर दिल्ली के लिएसाइकिल यात्रा शुरू की |सौ दिन में दिल्ली पहुची इस यात्रा मेंडी एस फोर के ३ लाख कार्यकर्ताओ नेसाढ़े सात हज़ार सभा करी , १० करोड़ सेज्यादा लोगो तक इस आन्दोलन के माध्यमसे समता और सम्मान की बात पहुचाई |कांशीराम का मानना था कि , — ” जबहम इस गैर बराबरी वाले समाज को ध्वस्तकर एक नए समाज की स्थापना के लिएसंघर्ष की बात करते है तो हमें विकल्पभी प्रस्तुत करना होगा और यह विकल्पराजनीतिक सत्ता को हासिल किये बगैरसंभव नहीं है | ” और कांशीराम ने —करोडो- करोड़ लोगो में सामाजिकराजनीतिक चेतना जगाने वाले बहुजनसमाज के नायक कांशीराम ने अपने जीतेजी राजनीतिक सत्ता- ताकत हासिलकरके दिखाई भी |भारतीय लोकतंत्र में कांशीरामद्वारा गठित राजनीतिक दल बहुजनसमाज पार्टी ने जोरदार आगाज़किया तथा सभी प्रमुख राजनीतिकदलों – नेताओ को अपने चातुर्य वरणनीति के तहत बार – बार घुटने टेकने परविवश किया | कांशीराम अपने समाजको जागृत करते हुये कहते थे ,–” शिक्षितकरो , संघर्ष करो तथा संगठित करो | ”कांशीराम का स्पष्टमानना था कि सामाजिककार्यवाही बिना उग्रता केहोनी चाहिए |मान्यवर कांशीराम की पुण्यतिथि पेअवकाश को रद्द किये जाने पेप्रतिक्रिया देते हुये साथी पत्रकारधनञ्जय सिंह लिखते है कि — यू पी में कांशीराम जयंती पर अवकाश रद्दहोना ठीक नहीं | यही एक प्रदेश हैजहा उनके प्रयोग धरातल पर उतरे | छुट्टी केबहाने ही सही लोग उन्हें याद करते | आपउन्हें नकार नहीं सकते |नोयडा निवासी सामाजिककार्यकर्ता अवधेश का मानना हैकि सीमित संसाधनों में समाज के सबसेनिचले वर्ग का संकलन कर उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के सत्ता शीर्ष पर बैठने वालेमा कांशीराम जी वन्दनिये है | भलेही उनके मिशन को आगे बढ़ाने वालेकार्यकर्ताओ का अभाव हो गया हैकिन्तु तब भी अभी तक उनके द्वारा कियेगये प्रयासों का अपेक्षित परिणामही आया है |